Twitter | Search | |
Kusum Sharma Antra
poetry
56
Tweets
13
Following
33
Followers
Tweets
Kusum Sharma Antra 21h
Very interesting
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra 21h
ग़ज़ल ज़रा बारूद भी सीने में हमने डाल रक्खा है तेरी हस्ती मिटाने को ये ग़ुस्सा पाल रक्खा है मुक़र्रर करने को तेरे गुनाहों की सज़ा हमने कई मुद्दत से ख़ुद को भी शिकस्ता-हाल रक्खा है यहाँ पर ग़ैर तो कोई नहीं सब अपने हैं तेरे लगाकर राग फ़िर कैसा ये बे-सुर-ताल रक्खा है अंतरा
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra 21h
Replying to @SachinChandail
Thanks a lot
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra 21h
Replying to @AnupamPKher
Wahhhhh bemisaal
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Jan 24
ग़ज़ल है रंजिश पुरानी नया जाल है हरिक भेड़िये की नई खाल है रहा ही नहीं वक़्त वैसे का वैसा चले हर पयादा नई चाल है हैं शह-मात के खेल सारे यहाँ करें क्या जो जनता ही बेहाल है कि रुख़ अब बहारें कहाँ का करें जो सैयाद बैठा हरिक डाल है कुसुम शर्मा अंतरा जम्मू कश्मीर
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Jan 20
Replying to @SachinChandail
आपका बहुत बहुत धन्यवाद जी
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Jan 20
ग़ज़ल आजकल दर्द दुआ बन के लगा करता है ज़हर भी अब तो दवा सा ही हुआ करता है वक़्त के साथ ग़म-ए-दौर भी कट जाएगा कब-कहाँ वक़्त ये इक़ जैसा रहा करता है कुछ तज़ुर्बों ने बहुत खूब बताया हमको कोई उठने के लिए कितना गिरा करता है कुसुम शर्मा अंतरा जम्मू कश्मीर
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Jan 18
ग़ज़ल बसे जो दिल के अहाते में इक़ ज़माने से बहुत वो याद हैं आए हमें भुलाने से गुमाँ था हमको कि हम बेख़बर हैं ख़ुद से भी जगे हैं दर्द मग़र उनके याद आने से जिगर के छालों का कुछ ज़िक्र तो करो हमसे सुना है ज़ख़्म सिमट जाते हैं दिखाने से कुसुम शर्मा अंतरा जम्मू कश्मीर
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra retweeted
Medhavi Sharma Jan 12
"बामोरा पई बामोरा , रंग बरंगा बामोरा। " During the day of Lohri, children wander around their neighborhood carrying "chajja" and singing songs. The children are welcomed in all the houses and presented with sweets , gifts and money.
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra retweeted
Medhavi Sharma Jan 13
अज्ज बोबो ओरेन दा पुग्गे दा बर्त ऐ। चन्न चढ़ने पर गै बर्त पोआरना । पुग्गे दा बर्त मामां अपने जागतें ते परिवार दी खुशाली आसे रखदियाँ न । Boboji is fasting for 'Pugga' today. On 'Pugga', dogra mothers fast for the prosperity of their children & family.
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Jan 13
ग़ज़ल वक़्त ज़ाया मत करो तक़रार में बंदिशें होती नहीं हैं प्यार में यह करिश्में हैं ख़ुदा के नूर के उल्फ़तें मिलती नहीं बाज़ार में तुम बने जो इश्क़ का क़िस्सा कोई छप गए हो दिल के हर अख़बार में तल्ख़ियों से पेश जो आओगे तो मुद्दतें लग जाएंगी इज़हार में अंतरा जम्मू कश्मीर
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Jan 6
ग़ज़ल शगूफे गुलशनों के कम न होंगे हुआ क्या जो जहाँ में हम न होंगे दुआओं से सहर मरहूम होगी वफ़ाओं से भरे शबनम न होंगे मिलेंगी शुहरतें औऱ क़ामयाबी मुहब्बत के फज़ा-ए-ग़म न होंगे लगेगी चोट जब दिल पर कभी तो हमारे प्यार के मरहम न होंगे अंतरा
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra retweeted
Medhavi Sharma Jan 4
LambadDaar ji having a conversation with Boboji while she prepares Lohri Garlands out of dry fruits for her grandchildren and brothers. (See first comment for the conversation in Dogri, also translated to English )
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra retweeted
Medhavi Sharma Jan 4
Replying to @artistMedhavi
Boboji - " On the occasion of Lohri I've prepared garlands out of dry fruits, for all my grandchildren and brothers. " Lambad-daar ji -" That's wonderful! " Boboji - " It's growing so cold dear. Enjoy the bonfire and tea. This shawl you got me from Basohli is very warm." 💓
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Dec 31
ग़ज़ल कोई कारवां तुम खड़ा तो करो शुरू इक़ सफ़र तुम नया तो करो बुझे हैं ये दिल के दिए किसलिए ज़रा दिल का आलम पता तो करो यूँ ख़ामोश रहना कहाँ ठीक है कभी हमसे तुम भी तो शिकवा करो जबां हैं किसी की हसीं हसरतें हमारी ये आँखें पढ़ा तो करो अंतरा
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Dec 25
यूँ बरगला के सियासत की बात तुम न करो है सच ये, सबकी ज़ुबाँ से हुज़ूर निकलेगा
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Dec 25
ग़ज़ल यह इश्क़ इत्र सा जाकर के दूर निकलेगा दबा के कितना भी रक्खो ज़रूर निकलेगा वो हौसलों के फ़लक का है इक़ सितारा कोई यकीं है उसका भी बाहर शऊर निकलेगा अड़ा है जलने की ज़िद्द में चराग़ अदना सा लगे यूँ आज हवा का ग़ुरूर निकलेगा अंतरा
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Dec 25
ग़ज़ल मुझसे रहने लगी क्यों खफ़ा ज़िन्दगी कोई इक़ तो वज़ह भी बता ज़िन्दगी मरते मरते भी मैंने जिया है तुझे तू भी ऐसे ही जी के दिखा ज़िन्दगी साथ चलने लगा मेरा महरम भी जब मुझको लगने लगी थी ख़ुदा ज़िन्दगी दम निकलते निकलते समझ आ गया कितने ज़ख्मों का थी काफ़िला ज़िन्दगी अंतरा
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Dec 18
अज़ब दीवानगी सी थी तेरे उस आज़माने में ज़माने लग गए "हम तो तेरे हैं" यह जताने में मिला बैठे हैं ख़ुद को ख़ाक में ख़ातिर तेरी जानां ज़रा भी हम नहीं झिझके थे ख़्वाबों को जलाने में चले आये हो बन कर काफ़िला यादों का फ़िर से तुम जले थे रात-दिन हम तो तुम्हें दिल से भुलाने में
Reply Retweet Like
Kusum Sharma Antra Dec 17
Replying to @THEBONEDOCTORO1
अति आभार
Reply Retweet Like